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विविध धर्मों-त्यौहारों के रीति-रिवाज, पूजा पद्धति, धार्मिक मंत्रों का समग्र संकलन

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काफिर

पोस्टेड ओन: 3 Aug, 2012  में

मुद्दतो बाद एक नज़्म ने फिर से छेड़ा है मुझे कुछ लफ्ज़ थे जो जुबान पे आने से कतरा रहे है फर्क कुछ खास नही आया है आलम में तब से अब तक पहले वो साथ थे मेरे,अब उस ओर से मुस्करा रहे है मै भी सोचता था कहकशे लगाऊंगा इबादत में उसकी मालूम न था कदम किस ओर चले जा रहे है वक़्त गुज़र गया हाथो से ,समझ तब आया काफ़िर रंज ऐ मोहब्बत हम अकेले ही निभाए जा रहे है साँसों की गर्मी में कुछ फंस से गये है वो हम है की ये ज़हर भी हंस के पिए जा रहे है और रह भी क्या गया है अब बस्ती में हमारी साकी बन गयी है महबूबा और हम फिरसे डूबे जा रहे है



Tags: बचपन की याद  

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HitechWebServices के द्वारा
March 17, 2011

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parveen sharma के द्वारा
March 16, 2011

ऐसे वक्त में जब ब्लोगर्स ज्यादा से ज्यादा प्रतिक्रिया पाने के लिए अन्य विषयों पर लिख रहे हैं…ऐसे में आप का ब्लोग्गर्स को शनि और हनुमान की महिमा से अवगत कराना एक सराहनीय काम है….एकदम लीक से हटकर….लगे रहो.




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