Religious Mantra, Festivals, Vrat katha, Poojan Vidhi

विविध धर्मों-त्यौहारों के रीति-रिवाज, पूजा पद्धति, धार्मिक मंत्रों का समग्र संकलन

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Religious-Spiritual Blog


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Vasant Panchami: यह देवी जीवन की जड़ता को दूर करती हैं

Posted On: 4 Feb, 2014  
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ज्योतिष में

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मकर संक्रांति वाले दिन उपायों को करना ना भूले !!

Posted On: 13 Jan, 2014  
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ज्योतिष में

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कालभैरव के दिन इन उपायों को करना ना भूलें !!

Posted On: 23 Nov, 2013  
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ज्योतिष में

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Chhath Puja 2013: खरना का विशेष महत्व है

Posted On: 6 Nov, 2013  
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ज्योतिष में

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पीपल के पेड़ के नीचे दीपावली रात…..

Posted On: 2 Nov, 2013  
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Religious ज्योतिष में

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ऐसे काम जिन्हें दीपावली वाले दिन ना करें !!

Posted On: 2 Nov, 2013  
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Religious ज्योतिष में

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तुम सब एक दम बेवकूफ हो,.क्या आप मुझे बता सकते हो,.की हमारे कौन से वेद में या हमारी किसी भी धार्मिक पुस्तक में,.किसी भी एक देवी देवता की पूजा लिखी है,..हमारे सारे वेदों में सिर्फ एक निराकार परमेश्वर की पूजा और आराधना लिखी हुई है,..आप में शायद से शायद कुछ ही लोग इश बात को जानते होंगे की हमारी आसमानी किताब वेद है,.जिसे स्वयम ब्रह्मा जी ने लिखा है,..इसमें किसी देवी देवता की नहीं,.सिफ एक निराकार परमेश्वर की पूजा और आराधना लिखी हुई है,...खुद ब्रह्मा,विष्णु,.महेश उष एक निराकर परमेश्वर की आराधना करते है,..एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा,.ये उष परमेश्वर का सच्चा मंत्र है,.क्युकी वही एक परमेश्वर सच्चा है और उसी एक परमेश्वर का नाम सच्चा है....

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राजनिती चालीसा भ्रश्टाचार चालीसा दोहा जनता के हक है , नेतन के पैरन की धुल ! हर नेता पाल रखत् है, गुन्डन को जनता के अनकूल ! अनपण नेतन के दुवारे , नतमस्तक होवै जात है अच्छॆ-अच्छॆ वीर् ! अपनी कुर्सी की धौश् में , भारत देश के नेता भ्रस्र्टाचार् को आपस में पकावैं खीर ! चौपाई जय हनुमान ग्यान गुन सागर ! भ्रश्टाचार राजनिति से उजागर !! जनता का सेवक चुनाव जीत हुआ बलवाना! बेईमानी उसकी माता,भ्रश्टाचार सुतनामा! जीत चुनाव हुआ अति बलवन्ती !शतबुध्दि को त्याग हुआ कुमति के संगी !! सोना चाँदी आगन ऎसे बिराजॆ ! जॆसे बारिश मे कुकूर मुत्ता घर आगन मे साजे !! बाहो मे बाला ऒर मदीरा बिराजॆ ! तन पर सफ़ेद कुर्ता ऒर द्दोती साजॆ !! राक्षसी प्रबृति के लोगो ने राजनिति का किया हॆ खंड्न ! फ़ॆली गुन्डा गर्दी हुआ समाज मे खन्ड्न!! विद्या वीहिन लोग हुए राजनिति मे अति चातूर ! कहते है मै हूँ जनता की सेवा करने को आतूर !! चरित्र वीहिन हो गया है सब नेता ! समाज के जितने भी अवगुण सब इनमे बस लेता !! भोली सकल लेकर जनता के सन्मुख आवा ! जीत चुनाव पाँच साल फिर नही कबहू मुँख दिखावा !! महाकाल रुप धरि सब कुछ लीए डकारे ! हमरे देश का कानून सुबह शाँम झाडू मारे इनके दुवारे !! गठबन्धन की राजनिति अब सवै चलावै ! मनमोहन कि छ्वी पर भी अब दाँग लगावे! राहूल ने भी की मनमोहन की बहुत बडाई ! तुम हो काग्रेस मे वेदाग नेताओ मे मेरे भाई !! आज सहज ही पूरा भारत तुम्हरे गुन गावै ! पर ऎसे मे भाजपा तुम्हरे गले की फाँस बनावै !! टेलीकाम,कामनवेल्थ,आ.पी.एल,आदर्शा ! राजा,कलमाडी,ललीतमोदी,अशॊकचौहान,सुरर्शा!! देश की जनता कुछ भी कह ले ईस जहा मॆ ! अब हमारा कोई कुछ नही कर सकता सारे जहा मे !! तुम सब हमे चुनाव जिताकर कोई उपकार नही है कीन्हा ! नोटो की गड्डी दारुँ की बोतल दी, तब तुमने वोट है दिन्हा !! हमेशा हमने झूठा प्रचार किया मनमानी ! मुरख जनता मुझको वोट देकर खुद से किया बेईंमानी !! स्वीज बैंक हजारो कोष दूर है, यारो जाना ! फ़िर दो-चार हजार वहा लेकर क्या जाना !! जनता की गाडी कमाई ! हमने दिया स्वीज बैंक मे जमा कराई !! ईतना जोखिम काम भला हम जनता को क्यो देते ! भारत मे बैंको की रखवाली फिर हम किसको देते !! कहने को हम है जनता के रखवारे ! लेकिन बिना हमारी आज्ञा कोई हाथ पॉव भी नही मारे !! राजनिति मे सब कुछ जायज है करना ! फिर देश की जनता और कानून से हमे क्या डरना !! हम अपनी गुन्डा गर्दी और बडाते जावैं ! देश की जनता को लूटते और डराते जावैं !! थाना-पुलिस कभी हमरे निकट नहि आवैं ! कमीने नेताओ का जब नाम सुनावै !! सरकारी महकमा समाज में है एक कीडा ! भॊली-भाली जनता को देती हरदम पीडा !! संकट मे ये अपनो को और फ़सावै ! पैसा कौडी,ईज्जत सब कुछ दाँव पर लगवावै !! कभी-कभार जनता होवै हैं सब पर भारी ! पर उनका भी हक गटक गये सबको किया भिखारी !! राजनिति में अगर कोई सच्चा आना चाहे ! समझ लो वह अपनी जिन्दगी से जान गवाए ! चारो दिशाओ में घुम-घुम किया अत्याचारा ! तब जाकर किया ईतना बडा भ्रस्टाचारा!! साधू सन्त सब है राजनिति के चट्टू-बट्टू ! गेरुवा वस्त्र पहन कर हर जनता को घुमाते लट्टू- लट्टू !! राजनिति में सब कुछ जायज ठहराया जाता ! चुनाव प्रचार में नेता बडे-बडे वादो का पुल बाधता जाता !! देश की जनता कट्पुतली,कानून हमारी मुट्टी में ! शाँम सवेरे तलवे चाटती पुलिस हमारी चुट्की में !! हमारे झूठे- झूठे भाषण् लोगो को अति भावै ! मानो वे अपने को जन्मो-जनम् धन्य व्हे जावै !! पाँच साल बाद नेता फिर जनता के बीच मे आवै ! जब वह फ़िर अपनी किस्मत को अजमावै !! लेकिन अब उसके अपने भी साथ न धरईं ! अब तो जेल मे बैठकर ऎश करईं !! सब अवगुन समाप्त करे राजनिति पिटारा ! जब राजनिति का लिया सहारा !! जै जै जै राजनिति गोसाईं ! तुम्हरी कृपा हम जैसन पर सदा बनाई !! जो सत् बार पाठ राजनिति चालीसा कोई !अपराध् मुक्त्त् समाज ईस देश मे पैदा होई !! दोहा नेता जनता से वादा करत संकट हरन , मुरख जनता भी पूजत नेता मंगल मुरत रुप ! नेतन की सब पीडीं जन्मो जनम राज करिहै ,ऎशन बिचार जनता अपने ह्र्दय में बषहूँ शुर भूप !!

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मनुष्य ने जब कभी ईश्वर को या उसके किसी गुण को या किसी मन्त्र की कल्पना मानवरूप में की तो उसे प्रकट करने के लिए उसने अलंकार का प्रयोग किया जो कालान्तर में जनमानस में एक स्वतन्त्र देवी या देवता के रूप में रूढ़ हो गयी । गायत्री मन्त्र के साथ भी यही हुआ। क्यों सर मैं कुछ ग़लत तो नहीं कह रहा हूं ? गायत्री मन्त्र वास्तव में एक महान मन्त्र है । इसकी महानता इतनी स्पष्ट है कि उसे समझने के लिए केवल इस पर एक दृष्टि डालना ही काफ़ी है । गायत्री मन्त्र ओं भूर्भुव स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । अलग अलग वेदविदों ने इस मन्त्र का अर्थ अलग अलग तरह किया है । उनकी समीक्षा करके उनमें से किसी के ठीक और किसी के ग़लत होने का निश्चय करना हमारा आज का विषय नहीं है । आज का विषय है ‘ गायत्री के महात्म्य ‘ के वास्तविक कारण को आत्मसात करना । छंद के कुल 7 में से एक प्रकार का नाम है गायत्री । इस मन्त्र की रचना इसी छंद में हुई है । ऋग्वेद में कुल 2450 मन्त्रों की रचना इस छंद में हुई है तो भी प्रायः यह छंद जाना इसी मन्त्र की वजह से जाना जाता है । हालाँकि यह निचृद छंद ( लंगड़ा छंद ) कहलाता है । लेकिन इसके मात्रात्मक गुण दोष की विवेचना करना भी आज हमारा अभीष्ट नहीं है ।हमारा मक़सद यह भी नहीं है कि हम यह तय करें कि वास्तव में सविता का अर्थ परमात्मा है या कि सूरज ? इस मन्त्र की महत्ता जानने के लिए आप इसके ‘ धियो यो नः प्रचोदयात ‘ पर ध्यान दीजिये । इसमें आप क्या पाते हैं ? यह एक ऐसे आदमी की वाणी है जो ‘ बुद्धि ‘ से युक्त है । यह स्वर एक ऐसी प्रज्ञा से उद्भूत है जो जीवन को निरूद्देश्य बिताने और व्यर्थ गंवाने के लिए तैयार नहीं है । सारी ‘शक्तियां जिस ‘ बुद्धि ‘ के अधीन हैं । वह उस बुद्धि को दिव्य चेतना से आप्लावित कर देना चाहता है ताकि वह उस महान कर्म को सम्पन्न कर सके जो कि वास्तव में उसकी उत्पत्ति से सृष्टिकत्र्ता को वांछित है । सविता का अर्थ चाहे सूर्य हो या फिर परमात्मा , यह विषय आज गौण है । मुख्य चीज़ वह तड़प ,वह दर्द है जो इस मन्त्रकत्र्ता के दिल को व्यथित कर रहा है । गायत्री छंद में रचे गये इस मन्त्र का सबसे बड़ा सरमाया मेरी नज़र में यही दर्द है । यही दर्द एक मनुष्य के हृदय में ज्ञान के आलोक को जन्म देता है और तभी मनुष्य को वह मार्ग स्पष्ट दिखाई देता है जो वास्तव में मानवता का मार्ग है । इसी मार्ग को धर्म के नाम से भी जाना जाता है । धर्म से ही मनुष्य को अपने गुण रूचि स्वभाव और योग्यता के अनुसार कर्म करने की प्रेरणा मिलती है । मनुष्य की रचना ईश्वर ने कर्म के लिए ही तो की है । पर कौन सा कर्म ? कर्म की संज्ञा मनुष्य की हरेक क्रिया को नहीं दी जा सकती ।जब तक मनुष्य की बुद्धि ईश्वरीय प्रेरणा से संपन्न नहीं होती है तब तक उसे कर्म का भी ज्ञान नहीं होता । कर्म का तात्पर्य सत्कर्म से है । एक सत्कर्मी व्यक्ति कभी कुकर्म नहीं कर सकता और हालात के दबाव में या अल्पज्ञता के कारण यदि वह कुछ ग़लत कर भी गुज़रता है तो भी वह उसे अपना मार्ग बनाने वाला नहीं है । क्योंकि जो ज्ञान उसने पाया है उसने उसे पाने के लिए असह्य कष्ट उठाया है । अपने बच्चे के लिए एक मां को कुर्बान होने तक के लिए जो चीज़ तैयार करती है वह एक दर्द ही तो है । यही दर्दमन्द दिल हक़ीक़त में दरकार है । इससे निकलने वाली हर पुकार मालिक को स्वीकार है । ऐसा दर्द आपके और मेरे दिल में जाग जाए । गायत्री मन्त्र के कत्र्ता का हेतु यही है । यदि हम इस भाव से रिक्त होकर मात्र इसका जाप करते रहे तो हमारा अभीष्ट कभी सिद्ध होने वाला नहीं है । न ही मन्त्रकत्र्ता ने कभी ऐसा किया है और न ही कहीं किसी को करने के लिए कहा है । सवाल यह नहीं है कि हम गायत्री को कितना जपते हैं ? बल्कि सवाल यह है कि हम गायत्री को कितना जी पाते हैं ? मैं गायत्री को जपता भी हूं और जीता भी हूं और आप ...? यही भावना हमें अज्ञान से और भारत को पतन से मुक्ति दिलाएगी । यही मन्त्र भाव हमें मार्ग दिखाएगा । लोक परलोक की सफलता इससे सिद्ध हो सकती है । क्या इसमें किसी को कोई ‘शक है ? जिसे मार्ग मिल जाए उसे मंज़िल ज़रूर मिलती है । मानवता आज अपनी मंज़िल को तलाश रही है । वह अपनी मंज़िल पा सकती है बशर्ते कि वह गायत्री पर विचार करे और उसके उस दर्द को उस तड़प को अपने दिल में जगा सके जो कि ज्ञान को जन्म देता है। ज्ञान को वेद कहते हैं । सर्वसमाधानकारी सर्वहितकारी ब्रह्म निज ज्ञान वेद को भी परमेश्वर ने जब कभी प्रकट किया तो किसी नेक पाक और इनसानियत के दर्दमन्द दिल पर ही प्रकट किया । आज भी वेद रहस्य को केवल वही समझ सकता है जिसके दिल में मानवता का दर्द है । गायत्री मन्त्र उस वेदना भाव को जगाता है जिससे वेद प्रसूत होता है । इसी कारण इसे वेदमाता कहते हैं ।

के द्वारा: vedquran vedquran




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